कांवड़ यात्रा सावन के महीने में सनातन वैदिक आर्य हिन्दुओं के द्वारा भगवान शिव के प्रति भक्ति और समर्पण का प्रतीक है। इस यात्रा में भक्त माँ गंगा का पवित्र जल लेकर पैदल चलते हुए शिवलिंग पर अर्पित कर भगवान शिव से आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।
यह यात्रा हिन्दू संस्कृति में धार्मिक और सामाजिक एकता का प्रतीक है,जिसमें विभिन्न जातियों और समुदायों के लोग एक साथ आते हैं।
कावड़ यात्रा का इतिहास प्राचीन हिन्दू धार्मिक परंपराओं से जुड़ा हुआ है। इस यात्रा की उत्पत्ति और इसके पीछे की मान्यताओं की समझ हमें पौराणिक कथाओं और धार्मिक ग्रंथों में मिलती है।
एक पौराणिक कथा के अनुसार समुद्र मंथन के समय जब देवताओं और असुरों ने अमृत प्राप्ति के लिए समुद्र मंथन किया, तो उसमें से विष भी निकला जिसे भगवान शिव ने अपने कंठ में धारण किया।
इस विष को पीने के बाद शिवजी को शीतलता प्रदान करने के लिए देवताओं ने गंगा जल अर्पित किया। इस घटना के बाद भक्तों ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए गंगा जल चढ़ाने की परंपरा को अपनाया।
भगवान शिव के प्रति समर्पण और भक्ति की यह प्राचीन परम्परा आज भी जारी,
आज हम आपको ऐसे ही शिव भक्त कावड़ियों के बारे में बतायेगें जो भगवान शिव के प्रति अपनी भक्ति और श्रद्धा प्रकट करने के लिए कावड़ यात्रा तो कर ही रहे है परंतु समाज को एक सन्देश भी दे रहे है।
ऐसे ही तीन दोस्त जतिन, दलीप और विवेक कावड़ यात्रा में हरिद्वार से जल लेकर फरीदाबाद आये। साथ ही अपनी इस यात्रा में इन्होंने समाज में बेटिओं के महत्त्व एवं उनकी शक्ति का सन्देश देने के लिए अपनी अपनी कावड़ यात्रा में दो पालने भी साथ लेकर चल रहे हैं। दोनों पालनों में बेटी स्वरूप गुड़िया रखी हैं। पालने पर लिखा हैं कि हर घर में एक बेटी होना जरूरी है।
वहीं दूसरे स्लोगन में लिखा है बेटी तू दुर्गा बन, काली बन, झांसी की रानी बन लेकिन लव जिहाद का शिकार मत बन। कांवड़िये जतिन ने बताया कि वह एक अस्पताल में काम करते हैं जहां गत वर्ष एक महिला की डिलीवरी हुई और उसने बेटी को जन्म दिया। बेटी के जन्म के बाद परिजन अफसोस करने लगे।
उन्होंने कहा कि आज के दौर में भी लोग बेटियों को बेटों से अलग समझते हैं।
ऐसे लोगों को वह इस कावड़ यात्रा से संदेश देना चाहते हैं कि अगर बेटियां नही होंगी तो वह कन्या पूजन कैसे करेंगे। अपने बेटों के लिए बहुएं कहां से लाएंगे।
आज समाज में बेटियों के प्रति जो उपेक्षा का भाव बना है। जिसके दुष्परिणाम के रूप आज बेटियां गर्भ में, दहेज़ के लालच में मार दी जाती है। इस उपेक्षा के पीछे बहुत हद तक समाज में इस्लामिक और ईसाईयत विचार का प्रभावी होना भी हैं। क्योंकि इन दोनों मतों के विचारों में स्त्री सिर्फ भोग की वस्तु मात्र हैं। इन कावड़ियों का यह सामजिक सन्देश समाज के प्रत्येक व्यक्ति को अपनाना चाहिए और अपनी बेटियों को सम्मान और सुरक्षा-शिक्षा देनी चाहिए।




