विश्नोई समाज और काले हिरण का इतिहास एक गहरे सांस्कृतिक और धार्मिक संबंध से जुड़ा है, जिसमें पर्यावरण संरक्षण और वन्यजीवों के प्रति समाज की गहरी निष्ठा दिखाई देती है। विश्नोई समाज की स्थापना 15वीं सदी में गुरु जम्भेश्वर जी (जिन्हें “जंभाजी” भी कहा जाता है) द्वारा की गई थी। इस समाज के अनुयायी प्रकृति और जीवों की रक्षा के लिए अपने जीवन को भी त्याग करने के लिए प्रतिबद्ध हैं। विश्नोई धर्म के 29 प्रमुख सिद्धांत हैं, जिनमें से कई वन्यजीव संरक्षण और पर्यावरण संतुलन पर आधारित हैं।

विश्नोई समाज और पर्यावरण संरक्षण:

विश्नोई समाज के सिद्धांतों में से एक महत्वपूर्ण नियम यह है कि वे जीव-हत्या का विरोध करते हैं और किसी भी प्रकार से वन्यजीवों को नुकसान पहुंचाने के विरुद्ध हैं। इसके चलते, वे न केवल वनस्पतियों और जीवों की रक्षा करते हैं, बल्कि जरूरत पड़ने पर अपनी जान भी न्योछावर करते हैं। 1730 में खेजड़ली नामक गाँव में विश्नोई समाज के 363 लोगों ने पेड़ों को कटने से बचाने के लिए अपने जीवन का बलिदान दिया था। इस घटना ने इस समाज को पर्यावरण संरक्षण के प्रति उनके दृढ़ संकल्प का प्रतीक बना दिया।

काले हिरण से संबंध:

विश्नोई समाज में काले हिरण (जिसे चिंकारा भी कहा जाता है) का विशेष धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व है। वे इन हिरणों को “पवित्र” मानते हैं और उनकी सुरक्षा करना अपना कर्तव्य मानते हैं। काले हिरण की हत्या या उसे नुकसान पहुंचाना विश्नोई समाज के लिए अत्यंत आपत्तिजनक है। यही कारण है कि जब भी किसी हिरण की हत्या होती है, तो विश्नोई समाज के लोग इसके खिलाफ सख्त कदम उठाते हैं।

काले हिरण शिकार मामला:

1998 में, बॉलीवुड अभिनेता सलमान खान पर राजस्थान के जोधपुर के पास काले हिरण के शिकार का आरोप लगाया गया था। यह मामला विश्नोई समाज की भावनाओं से गहराई से जुड़ा हुआ था, क्योंकि उन्होंने वन्यजीव संरक्षण के सिद्धांतों के उल्लंघन का विरोध किया। विश्नोई समाज इस मामले में सक्रिय रूप से न्याय की मांग करता रहा है, और इस घटना ने भारत में वन्यजीव संरक्षण और कानून के पालन पर राष्ट्रीय स्तर पर बहस को जन्म दिया। इस प्रकार, विश्नोई समाज का काले हिरण और अन्य वन्यजीवों से संबंध उनके धार्मिक विश्वासों और पर्यावरण संरक्षण के प्रति उनके गहरे समर्पण का प्रतीक है।